एक अजनबी जो मुझे प्यारा है
जो लगा दिल को अपना सा
उसका चेहरा था एक महताब
जिस्में जला मेरा वजूद सारा
उनके आंखों में डूब के
भूला दिया गम जीवन भर का
की बातें चंद, थी मुलाकात दो घङी की
फिर भी लगा की है बन्धन अपना सदियों का
ना जाने क्यों है हर पल ख़याल उनका
जानता हूँ वो था ख्वाब पल दो पल का
अब तो बस गए हैं वो ख्यालों में
बस आस है पल पल उनके आने का
अब सुकून नहीं आयेगा दिल को उनसे मिले बिना
लेकिन उन्हें बुलाये भी तो देके वास्ता कीस रिश्ते का
था वो अजनबी मगर लगा दिल को प्यारा
पहले था बेगाना सा, लेकिन अब लगे अपना सा