Monday, June 04, 2007

प्रशांत की तरफ से..................

उस एहसास को क्या नाम दूँ..
जो तस्सबुर से तेरे आता है
और दिल को मेरे छू जाता है
लाखों कि भीड़ में भी
तनहाई का एहसास दिलाता है
उस एहसास को क्या नाम दूँ

उन नजरो को क्या नाम दूँ
जो अपने आप को मुझसे चुराती हैं
हर उठती चिलमन के साथ
कत्ल-ए- आम मचाती हैं
गर गलती से कभी मिल जाये मेरी नजरो से वो नज़रे
तो हया से झुक जाती हैं
उन नजरो को क्या नाम दूँ

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