कहीँ ये प्यार तो नहीं.......
पिछले कुछ दिनों से मेरे,
हालात ही कुछ और हैं
भीड़ में तनहा सा रहूँ,
तनहाई लगती शोर है
कहीँ ये प्यार तो नहीं.........
अब रोज़ सवेरे आंखों में,
धुंधली सी इक तस्वीर दिखे
और उस तस्वीर में अब कोई
कुछ हलके-हलके रंग भरे
और शाम कि आहट सुनते ही
दिल को कुछ होने लगता है
कभी यूं ही हंसने लगता है
कभी यूं ही रोने लगता है
इक अनजाने से चेहरे को
वो खुद में संजोने लगता है
कुछ बीज अधूरे ख़्वाबों के
दिल फिर से बोने लगता है
और रात का आलम ना पूछो
इक सन्नाटा सा रहता है
कि एक अजब चाहत का दिया
कुछ जलता-बुझता रहता है
और रोज़ अँधेरी रातों में
ये दिल आवाजें करता है
कुछ बातें किसी से कहता है
कुछ बातें सुनता रहता है
कहीँ ये प्यार तो नहीं..................
2 comments:
nice poem .... awsome
it left me to think कहीँ ये प्यार तो नहीं
ये प्यार ही है
ankhon main ho jab unki tasverr
sanson main ho jab basti ho unki khusbo
tab samjho ho gaya hai aapko pyar pyare
Godd to see this side of ur personality.............
its really a nice poem.....
Carry on buddy...
Akhil.
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