हमारी सोने की आदत ने ले ली है मेरी जान
जागते ही होती है गुशलखाने में जम कर कसरत
फिर भागना हमारा ऑफिस की ओर
और चोरी छिपे घुसना
कि कहीँ ना देख ले मेनेजर
आज भी हमें लेट आते हुए
आज फिर वही सामने मिला दरवाजे पे
देख कर एक हिराकत वाली नजर से
कर दिया उसने नाजरोंदाज मेरा आना लेट
मगर वो थी हमारी थोङी देर कि खुशी
बुला के अपने केबिन में
सुनायी दुनिया भर कि बातें
कहा की अगर चलता रह ऐसा
कहीँ दिखा ना दिया जाये दरवाजा बाहर का
कम्बखत इस नींद ने
मुझे ऑफिस में भी कहीँ का ना छोरा
खाने के बाद आती रहती है जम्हाई लगातार
इछा करती रही सो जाऊं इछा के चादर
शाम में भी नहीं करता मन कम का
और बुरा होता है हाल हमारा
जब काम हो हजार और किया हो सिर्फ दो चार
हमारी सोने की आदत ने
ले ली है हमारी जान ......
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