Thursday, April 19, 2007

हमारी सोने की आदत ने ले ली है मेरी जान


जागते ही होती है गुशलखाने में जम कर कसरत


फिर भागना हमारा ऑफिस की ओर



और चोरी छिपे घुसना


कि कहीँ ना देख ले मेनेजर


आज भी हमें लेट आते हुए



आज फिर वही सामने मिला दरवाजे पे


देख कर एक हिराकत वाली नजर से


कर दिया उसने नाजरोंदाज मेरा आना लेट



मगर वो थी हमारी थोङी देर कि खुशी


बुला के अपने केबिन में


सुनायी दुनिया भर कि बातें


कहा की अगर चलता रह ऐसा


कहीँ दिखा ना दिया जाये दरवाजा बाहर का



कम्बखत इस नींद ने


मुझे ऑफिस में भी कहीँ का ना छोरा


खाने के बाद आती रहती है जम्हाई लगातार


इछा करती रही सो जाऊं इछा के चादर


शाम में भी नहीं करता मन कम का


और बुरा होता है हाल हमारा


जब काम हो हजार और किया हो सिर्फ दो चार



हमारी सोने की आदत ने


ले ली है हमारी जान ......

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