जुगलबन्दी
दीपक: ग़र बाजी इश्क की बाजी है
जो चाहो लगा दो डर कैसा
सुमन: वाह वाह
दीपक: जो जीत गए तो क्या कहना
ग़र हारे तो कोई बात नहीं
दीपक: दिल , ना -उम्मीद तो नहीं , ना काम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है
दीपक: आज उन्होने ही नज़रों से गिरा डाला
जिन्हें हम गिरने से पहले थाम लेते हें
सुमन: हर कदम पर गिरे ... गिरे गिरे ... गिर्र्र्र्र्र्र्रे
मगर सिखा कैसे गिरतों को थाम लेते हें
दीपक : सुभान -अल्लाह
सुमन: शुक्रिया
दीपक: जो भी किया उनके प्यार ने करवाया
आप हमको क्यों इलज़ाम देते हें
सुमन: कतल किया उन्होने अपने आँखों से
फिर सरे आम इल्जाम से मुकर जाते हें
और देखिए उनकी बेवफाई
कब्र पे आते हें और मुस्कारते हुए चले जाते हें
दीपक: शुक्र है इस बहाने वो कब्र पे तो आते है
आशिक तो कब्र में भी उन्हीं के इंतज़ार में पाए जाते है
दीपक: चल दिए दिल तोड़ कर वो हमारा
और कहते हें की "आप किधर जाते हें "
सुमन: इंतज़ार कर कर के उस जालिम का हम हो गए फना
वो आये हमारे जनाजे में हो के पर्दा-नशीं
दीपक: अपने चहरे के नूर से वाकिफ वो है
उनको डर हैं हम जिंदा ना हो जायेँ कहीँ
2 comments:
noor se unke agar je bhi gaya tu..
dekh ke unko mar jayega phir se...
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