Wednesday, April 25, 2007

जुगलबन्दी


दीपक: ग़र बाजी इश्क की बाजी है
जो चाहो लगा दो डर कैसा


सुमन: वाह वाह

दीपक: जो जीत गए तो क्या कहना
ग़र हारे तो कोई बात नहीं

दीपक: दिल , ना -उम्मीद तो नहीं , ना काम ही तो है
लंबी है गम की शाम, मगर शाम ही तो है



दीपक: आज उन्होने ही नज़रों से गिरा डाला
जिन्हें हम गिरने से पहले थाम लेते
हें

सुमन: हर कदम पर गिरे ... गिरे गिरे ... गिर्र्र्र्र्र्र्रे
मगर सिखा कैसे गिरतों को थाम लेते हें


दीपक : सुभान -अल्लाह

सुमन: शुक्रिया

दीपक: जो भी किया उनके प्यार ने करवाया
आप हमको क्यों इलज़ाम देते हें

सुमन: कतल किया उन्होने अपने आँखों से
फिर सरे आम इल्जाम से मुकर जाते हें

और देखिए उनकी बेवफाई
कब्र पे आते हें और मुस्कारते हुए चले जाते हें

दीपक: शुक्र है इस बहाने वो कब्र पे तो आते है
आशिक तो कब्र में भी उन्हीं के इंतज़ार में पाए जाते है

दीपक: चल दिए दिल तोड़ कर वो हमारा
और कहते हें की "आप किधर जाते हें "


सुमन: इंतज़ार कर कर के उस जालिम का हम हो गए फना
वो आये हमारे जनाजे में हो के पर्दा-नशीं


दीपक: अपने चहरे के नूर से वाकिफ वो है
उनको डर हैं हम जिंदा ना हो जायेँ कहीँ

2 comments:

Kumar Prashant said...

noor se unke agar je bhi gaya tu..
dekh ke unko mar jayega phir se...

Anonymous said...

https://www.blogger.com/comment.g?blogID=33949489&postID=2923452873302572502&bpli=1